जमशेदपुर (ब्यूरो)। मोबाइल और सोशल मीडिया की बढ़ती लत बच्चों का बचपन धीरे-धीरे छीन रही है. घंटों तक स्क्रीन पर समय बिताने की आदत अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर बच्चों की पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य, व्यवहार और पारिवारिक संबंधों पर भी साफ दिखाई देने लगा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त नियंत्रण और सीमित उपयोग बेहद जरूरी हो गया है. इसी विषय को केंद्र में रखते हुए दैनिक जागरण-आई नेक्स्ट के विशेष अभियान LOGOUT@16 के तहत विवेकानन्द इंटरनेशनल स्कूल में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी दी गई.मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असरक्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ निधि श्रीवास्तव ने कहा कि कम उम्र में लगातार मोबाइल और स्क्रीन के संपर्क में रहने से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है. उन्होंने बताया कि स्क्रीन एडिक्शन के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, तनाव, आत्मविश्वास में कमी, नींद की समस्या और पढ़ाई में ध्यान न लगने जैसी परेशानियां तेजी से बढ़ रही हैं. उन्होंने कहा कि कई बच्चे सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स और कमेंट्स को ही अपनी पहचान मानने लगते हैं, जिससे उनमें असुरक्षा और मानसिक दबाव बढ़ने लगता है. उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं और घर में ldquo;मोबाइल फ्री टाइमrdquo; तय करें. सुझाव दिया कि हर परिवार को घर में रोज कम से कम एक घंटे का ldquo;मोबाइल फ्री जोनrdquo; बनाना चाहिए. इस दौरान घर के सभी सदस्य मोबाइल और टीवी से दूर रहकर एक-दूसरे के साथ समय बिताएं. परिवार के साथ बातचीत करना, खेल खेलना, किताबें पढ़ना या साथ बैठकर भोजन करना बच्चों के मानसिक विकास और भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करता है. विशेषज्ञों का कहना है कि परिवार में संवाद बढ़ने से बच्चों में अकेलेपन और तनाव की भावना भी कम होती है.साइबर अपराध का खतराकार्यक्रम में सिटी एसपी ललित कुमार मीणा ने छात्रों को साइबर अपराधों से बचने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए. उन्होंने कहा कि आज साइबर बुलिंग, फेक प्रोफाइल, ऑनलाइन गेमिंग फ्रॉड और सोशल मीडिया हैकिंग जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. छात्रों को किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक नहीं करने, निजी जानकारी साझा न करने और संदिग्ध अकाउंट्स से सावधान रहने की सलाह दी गई. उन्होंने कहा कि कई बार बच्चे मजाक या दोस्ती के नाम पर अपनी निजी तस्वीरें और जानकारी सोशल मीडिया पर साझा कर देते हैं, जिसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है. विशेषज्ञों ने कहा कि केवल बच्चों को समझाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि अभिभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. समाज सेविका रीता पात्रा ने कहा कि मोबाइल तकनीक पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है. ऑनलाइन पढ़ाई और जानकारी हासिल करने के कई सकारात्मक पहलू हैं, लेकिन बिना निगरानी के लगातार स्क्रीन टाइम बच्चों के विकास के लिए खतरा बनता जा रहा है. उन्होंने कहा कि अभिभावकों को बच्चों के मोबाइल उपयोग पर नजर रखने के साथ-साथ खुद भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा.रियल जिंदगी से जुड़ना जरूरीकार्यक्रम में पहुंचे सिविल डिफेंस के दया मिश्रा ने कहा कि वर्चुअल लाइक्स और फॉलोअर्स से ज्यादा जरूरी वास्तविक जीवन में संतुलित और स्वस्थ जीवनशैली है. उन्होंने कहा कि आज बच्चे मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं, जिससे उनका सामाजिक जुड़ाव कमजोर हो रहा है. वक्ताओं ने छात्रों को डिजिटल अनुशासन अपनाने और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बचने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि बच्चों को खेल, किताबों और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना बेहद जरूरी है, ताकि वे वास्तविक दुनिया से जुड़े रहें और मानसिक रूप से स्वस्थ बन सकें.समय रहते नहीं चेते तो बढ़ेगी समस्याविशेषज्ञ एवं समाजसेवी मुख्तार आलम खान ने कहा कि यदि समय रहते इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में बच्चों में मानसिक तनाव, सामाजिक दूरी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ सकती हैं. कार्यक्रम के दौरान छात्रों ने भी विशेषज्ञों से सवाल पूछे और डिजिटल दुनिया से जुड़े अपने अनुभव साझा किए. स्कूल प्रबंधन ने कहा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए डिजिटल संतुलन और सुरक्षित इंटरनेट उपयोग आज समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है. अंत में छात्रों और अभिभावकों को यह संदेश दिया गया कि ldquo;सोशल मीडिया जीवन का हिस्सा हो सकता है, लेकिन पूरी जिंदगी नहीं.rdquo;मोबाइल से दूरी बनाने के 10 टिप्स-रोज कम से कम 1 घंटे का ldquo;मोबाइल फ्री जोनrdquo; घर में जरूर बनाएं.-16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर सीमित नियंत्रण रखें.-बच्चों को आउटडोर गेम्स, किताबें और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ें.-सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल और स्क्रीन का इस्तेमाल बंद कर दें.-पढ़ाई के दौरान मोबाइल नोटिफिकेशन ऑफ रखें और स्क्रीन टाइम तय करें.-अभिभावक खुद भी मोबाइल का संतुलित उपयोग करें, ताकि बच्चे उनसे सीख सकें.-खाने की टेबल और पारिवारिक समय को पूरी तरह ldquo;नो मोबाइल टाइमrdquo; बनाएं.-किसी भी अनजान लिंक, फेक प्रोफाइल या संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि से बच्चों को सतर्क रखें.-बच्चों से रोज खुलकर बातचीत करें और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें.-लाइक्स और फॉलोअर्स को सफलता का पैमाना न मानें., बच्चों में आत्मविश्वास और वास्तविक जीवन के रिश्तों को मजबूत करें.
क्या बोले स्टूडेंट्ससोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने से पढ़ाई और खेल दोनों प्रभावित होते हैं. 16 साल से पहले बच्चों को इसकी लत जल्दी लग जाती है.-अब्दुल रजी
मोबाइल और सोशल मीडिया की वजह से बच्चे परिवार और दोस्तों से दूर होते जा रहे हैं. कम उम्र में इसका इस्तेमाल खतरनाक है.-इमामा
सोशल मीडिया पर कई गलत और हिंसक चीजें भी दिखती हैं, जिनका बच्चों के दिमाग पर बुरा असर पड़ता है.-इशिका महतो
16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से ज्यादा किताबों, खेल और क्रिएटिव एक्टिविटी में समय देना चाहिए.-कहकशां
सोशल मीडिया की वजह से बच्चों में तनाव, गुस्सा और अकेलापन बढ़ रहा है. इसलिए इसकी उम्र सीमा तय होनी चाहिए.-कशमा परवीन
कम उम्र में सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से बच्चे जल्दी स्क्रीन एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है.-मानताशा
बच्चों को असली दुनिया, खेल और परिवार से जोड़ना ज्यादा जरूरी है. दैनिक जागरण आईनेक्स्ट के इस अभियान से हमे बहुत कुछ सीखने को मिला.-मो आमिर

